कुदरती कथाभूमि की उर्वरता का सवाल
कुदरती कथाभूमि की उर्वरता का सवाल in a seminar रामनाथ शिवेंद्र मौजूदा समय में कथासाहित्य अपनी जीवंतता तथा प्रभावोत्पादकता के कारण साहित्य की सभी जनप्रिय विधाओं में विशेष दर्जे का अधिकारी बन चुका है। इस लिए अनिवार्य हो जाता है कि देशज कथाभूमि को आयातीत चिंतनों व विचारणों से बंजर बनाने की कुटिल चालों की रोकथाम किया जाये तथा कथा के सभी आयामों को देशी भूमि पर समत्वम् वाले बीज से हरा भरा किया जाये। वैसे तो समकालीन कथा के पाठक भी अन्य साहित्यिक विधाओं के पाठकों की तुलना में अपने सयानेपन पर ज्यादा मुग्ध दीख रहे हैं। यही हालत कथासाहित्य के कृतिकारों का भी है। समता, सहकार, सहयोग, भाईचारा और सामजिक हितों को बचाने के लिए अहिंसक प्रतिरोध बुनियादी रूप से कथासाहित्य के लिए प्रस्तावित थे, मानवीय समीपताओं को स्थापित करना कराना भी प्रस्तावित था, पर समकालीन कथासाहित्य का जो विकास क्रम है क्या वह अपने विषय, भाषा व प्रस्तुतीकरण के द्वारा मानवीय समीपताओं तक पहुंच सका है या सामाजिक बदलावों के लिए जो अहिंसक जनप्रतिरोध अभिष्ट थे उसे हासिल कर पाने में इसकी कोशिशें उल्लेखनीय हैं। मुझे लगता है कि आज के बाज...